मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ ३२ ॥
māṁ hi pārtha vyapāśhritya ye ’pi syuḥ pāpa-yonayaḥ striyo vaiśhyās tathā śhūdrās te ’pi yānti parāṁ gatim
हिंदी अर्थ
हे पार्थ! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि — जो कोई भी हों, वे भी मेरे शरण होकर परम गति को ही प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
यह श्लोक उन वर्गों का नाम लेता है जिन्हें उस समय का समाज प्रायः वैदिक विद्या से वंचित रखता था, और घोषणा करता है कि भक्ति सबके लिए, बिना किसी अपवाद के, परम लक्ष्य का द्वार खोलती है। भक्ति आंदोलन ने इस सार्वभौमिक वचन से बहुत प्रेरणा ली।