Bhakti ArohanBhakti Arohan

भगवद्गीता — अध्याय 9, श्लोक 33

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३ ॥

kiṁ punar brāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣhayas tathā anityam asukhaṁ lokam imaṁ prāpya bhajasva mām

हिंदी अर्थ

फिर इसमें तो कहना ही क्या है, जो पुण्यशील ब्राह्मण तथा राजर्षि भक्तजन मेरी शरण होकर परम गति को प्राप्त होते हैं। इसलिए तू सुख-रहित और क्षणभंगुर इस मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर निरंतर मेरा ही भजन कर।

भावार्थ

"अनित्यम् असुखं लोकम्" — अनित्य, सुख-रहित संसार। यह निराशावाद नहीं, बल्कि तत्परता है: क्योंकि यहाँ जीवन संक्षिप्त और अनिश्चित है, इसलिए इसका उपयोग उसके लिए करना चाहिए जो वास्तव में स्थायी है — ईश्वर-भक्ति।

भगवद्गीता अध्याय 9.33 | Bhakti Arohan