Bhakti ArohanBhakti Arohan

भगवद्गीता — अध्याय 6, श्लोक 28

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८ ॥

yuñjann evaṁ sadātmānaṁ yogī vigata-kalmaṣhaḥ sukhena brahma-sansparśham atyantaṁ sukham aśhnute

हिंदी अर्थ

वह पाप-रहित योगी इस प्रकार निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप अनंत आनंद का अनुभव करता है।

भावार्थ

"सुखेन" — सहजता से। जो प्रयास से आरंभ हुआ था (श्लोक 24–26), वह अंततः स्वाभाविक हो जाता है। "ब्रह्मसंस्पर्शम्" — ब्रह्म का स्पर्श — एक आत्मीय चित्र है: ईश्वर केवल जाना नहीं, अनुभव किया जाता है।

भगवद्गीता अध्याय 6.28 | Bhakti Arohan