कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥
karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo ’stvakarmaṇi
हिंदी अर्थ
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। कर्मफल तुम्हारा उद्देश्य न हो, और न ही कर्म न करने में तुम्हारी आसक्ति हो।
भावार्थ
संभवतः गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक — "कर्मण्येवाधिकारस्ते"। इसके चार भाग हैं: कर्म करो; फलों पर दावा मत करो; फल को अपना उद्देश्य मत बनाओ; और इसे कुछ न करने का बहाना मत बनाओ। यह परिणामों की चिंता छोड़ने का नहीं, बल्कि उनका दास न बनने का आह्वान है — कर्म में अपना सर्वश्रेष्ठ देना, और फल को जैसे आए वैसे आने देना।