देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ ३० ॥
dehī nityam avadhyo ’yaṁ dehe sarvasya bhārata tasmāt sarvāṇi bhūtāni na tvaṁ śhochitum arhasi
हिंदी अर्थ
हे भारत! सबके शरीर में रहने वाला यह देही (आत्मा) सदा अवध्य है। इसलिए तुम्हें किसी भी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए।
भावार्थ
यह श्लोक पहले तर्क — आत्मा के स्वरूप — को समाप्त करता है, जो श्लोक 11 से चल रहा था। "सर्वस्य" और "सर्वाणि भूतानि" पर ध्यान दें: वही शाश्वत आत्मा हर प्राणी में है, केवल मनुष्यों या केवल मित्रों में नहीं। यह सार्वभौमिकता आगे सबके प्रति करुणा का आधार बनेगी।