योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ ४७ ॥
yoginām api sarveṣhāṁ mad-gatenāntar-ātmanā śhraddhāvān bhajate yo māṁ sa me yuktatamo mataḥ
हिंदी अर्थ
संपूर्ण योगियों में भी जो श्रद्धावान योगी मुझमें लगे हुए अंतरात्मा से मुझको निरंतर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है।
भावार्थ
पहले छह अध्यायों का अंतिम श्लोक सब कुछ भक्ति के मुकुट से सजाता है। सब योगियों में सर्वश्रेष्ठ वह है जो श्रद्धा से और ईश्वर में लीन हृदय से उनकी उपासना करता है। यह अध्याय 7–12 का मार्ग तैयार करता है, जहाँ भक्ति केंद्रीय विषय बन जाती है।