न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् । अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८ ॥
na hi prapaśhyāmi mamāpanudyād yach-chhokam uchchhoṣhaṇam-indriyāṇām avāpya bhūmāv-asapatnamṛiddhaṁ rājyaṁ surāṇāmapi chādhipatyam
हिंदी अर्थ
मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखता जो इंद्रियों को सुखा देने वाले मेरे इस शोक को दूर कर सके — चाहे पृथ्वी पर निष्कंटक समृद्ध राज्य मिले, या देवताओं का आधिपत्य भी।
भावार्थ
अर्जुन ने एक महत्वपूर्ण बात समझ ली है: कोई बाहरी लाभ भीतर के घाव को नहीं भर सकता। स्वर्ग का राज्य भी उनका शोक दूर नहीं करेगा। यही समझ उन्हें श्रीकृष्ण की शिक्षा के योग्य बनाती है, जो शोक को उसकी जड़ से दूर करेगी, कोई बेहतर सौदा देकर नहीं।