कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७ ॥
kārpaṇya-doṣhopahata-svabhāvaḥ pṛichchhāmi tvāṁ dharma-sammūḍha-chetāḥ yach-chhreyaḥ syānniśhchitaṁ brūhi tanme śhiṣhyaste ’haṁ śhādhi māṁ tvāṁ prapannam
हिंदी अर्थ
कायरता रूपी दोष से मेरा स्वभाव दब गया है और धर्म के विषय में मेरा चित्त मोहित है। मैं आपसे पूछता हूँ — जो निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह मुझे बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आया हूँ; मुझे शिक्षा दीजिए।
भावार्थ
यह पूरी गीता का निर्णायक मोड़ है। अब तक अर्जुन श्रीकृष्ण से मित्र की तरह तर्क कर रहे थे; अब वे कहते हैं "शिष्यस्तेऽहं" — मैं आपका शिष्य हूँ — और "त्वां प्रपन्नम्" — मैं आपकी शरण में हूँ। पारंपरिक टीकाकार कहते हैं कि वास्तविक शिक्षा इसी क्षण आरंभ हो सकती है: जब व्यक्ति स्वीकार करे कि वह नहीं जानता और सच्चे मन से पूछे। यहाँ से श्रीकृष्ण जो कुछ कहते हैं, वह इसी निवेदन का उत्तर है।