न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । यानेव हत्वा न जिजीविषाम स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥
na chaitadvidmaḥ kataranno garīyo yadvā jayema yadi vā no jayeyuḥ yāneva hatvā na jijīviṣhāmas te ’vasthitāḥ pramukhe dhārtarāṣhṭrāḥ
हिंदी अर्थ
हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है — हम उन्हें जीतें या वे हमें जीतें। जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहेंगे, वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने खड़े हैं।
भावार्थ
यही अर्जुन की दुविधा का केंद्र है: वे यह भी नहीं बता पा रहे कि किस परिणाम की आशा करें। विजय भी पराजय जैसी लगेगी। अनेक पाठक इस अवस्था को पहचानते हैं — ऐसा निर्णय जहाँ हर विकल्प हानि की ओर ले जाता दिखे — और इसीलिए गीता का उत्तर युद्धभूमि से बहुत दूर के लोगों से भी बात करता है।