Bhakti ArohanBhakti Arohan

भगवद्गीता — अध्याय 9, श्लोक 18

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८ ॥

gatir bhartā prabhuḥ sākṣhī nivāsaḥ śharaṇaṁ suhṛit prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṁ nidhānaṁ bījam avyayam

हिंदी अर्थ

प्राप्त होने योग्य परम धाम, भरण-पोषण करने वाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ का देखने वाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, प्रत्युपकार न चाहकर हित करने वाला सुहृद्, सबकी उत्पत्ति-प्रलय का हेतु, स्थिति का आधार, निधान और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ।

भावार्थ

एक सुंदर नाम-माला। इन नामों में "शरणम्" (शरण) और "सुहृत्" (मित्र) विशेष हैं: ईश्वर केवल ब्रह्मांड के कारण नहीं, बल्कि वह हैं जिनकी ओर हम मुड़ सकते हैं और जिन पर भरोसा कर सकते हैं।

भगवद्गीता अध्याय 9.18 | Bhakti Arohan