Bhakti ArohanBhakti Arohan

भगवद्गीता — अध्याय 1, श्लोक 45

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ ४५ ॥

aho bata mahat pāpaṁ kartuṁ vyavasitā vayam yad rājya-sukha-lobhena hantuṁ sva-janam udyatāḥ

हिंदी अर्थ

अहो! कितने आश्चर्य और खेद की बात है कि हम बड़ा पाप करने को तैयार हो गए हैं — राज्य-सुख के लोभ में अपने ही स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हैं!

भावार्थ

"अहो बत" पीड़ा की पुकार है। श्लोक 38 में जो लोभ का आरोप उन्होंने कौरवों पर लगाया था, अब अर्जुन उसे स्वयं पर लगाते हैं। यह कष्टदायक आत्म-परीक्षण का क्षण है — और इस बात का संकेत कि उनका शोक उनके विवेक पर कितना पूरी तरह छा गया है।

भगवद्गीता अध्याय 1.45 | Bhakti Arohan