प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥ २९ ॥
prakṛiter guṇa-sammūḍhāḥ sajjante guṇa-karmasu tān akṛitsna-vido mandān kṛitsna-vin na vichālayet
हिंदी अर्थ
प्रकृति के गुणों से अत्यंत मोहित हुए लोग गुणों और कर्मों में आसक्त रहते हैं; उन अल्पज्ञ मंदबुद्धि लोगों को पूर्ण ज्ञानी विचलित न करे।
भावार्थ
श्रीकृष्ण श्लोक 26 की सलाह दोहराते हैं: लोग जहाँ हैं, उसका सम्मान करो। जो सत्य का केवल एक अंश जानते हैं, उन्हें भी ईमानदारी से कर्म करने से लाभ होता है; उनकी श्रद्धा को समय से पहले डिगाने से किसी का भला नहीं होता।