मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥ ३० ॥
mayi sarvāṇi karmāṇi sannyasyādhyātma-chetasā nirāśhīr nirmamo bhūtvā yudhyasva vigata-jvaraḥ
हिंदी अर्थ
सब कर्मों को मुझमें अर्पित करके, आत्मा में चित्त लगाकर, आशा-रहित और ममता-रहित होकर, संताप-रहित होकर युद्ध करो।
भावार्थ
एक श्लोक में कर्मयोग का सार: हर कर्म ईश्वर को अर्पित करो, मन को आत्मा में रखो, लालसा और ममता छोड़ो — और फिर पूर्ण रूप से कर्म करो। "विगतज्वरः" — ज्वर उतर जाने पर — अर्जुन की व्याकुलता के स्थान पर आने वाली शांति का सुंदर वर्णन है।