ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥
ye me matam idaṁ nityam anutiṣhṭhanti mānavāḥ śhraddhāvanto ’nasūyanto muchyante te ’pi karmabhiḥ
हिंदी अर्थ
जो मनुष्य दोष-दृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सब कर्मों के बंधन से छूट जाते हैं।
भावार्थ
दो शर्तें: श्रद्धा और असूया (दोष-दृष्टि या ईर्ष्या) से मुक्ति। श्रीकृष्ण पूर्ण अभ्यास की माँग नहीं करते — सच्चा, विश्वासपूर्ण प्रयास ही कर्म के बंधनों को ढीला करना आरंभ करने के लिए पर्याप्त है।