Bhakti ArohanBhakti Arohan

भगवद्गीता — अध्याय 5, श्लोक 3

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥

jñeyaḥ sa nitya-sannyāsī yo na dveṣhṭi na kāṅkṣhati nirdvandvo hi mahā-bāho sukhaṁ bandhāt pramuchyate

हिंदी अर्थ

हे महाबाहो! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, उसे सदा संन्यासी ही समझना चाहिए; क्योंकि द्वंद्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक बंधन से मुक्त हो जाता है।

भावार्थ

श्रीकृष्ण संन्यास को नए ढंग से परिभाषित करते हैं। सच्चा संन्यासी गेरुए वस्त्रों या वनवास से नहीं, बल्कि एक आंतरिक अवस्था से पहचाना जाता है: न द्वेष, न आकांक्षा। संसार में काम करने वाला गृहस्थ भी "नित्य-संन्यासी" — सदा का संन्यासी — हो सकता है।

भगवद्गीता अध्याय 5.3 | Bhakti Arohan