जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७ ॥
jitātmanaḥ praśhāntasya paramātmā samāhitaḥ śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu tathā mānāpamānayoḥ
हिंदी अर्थ
सर्दी-गर्मी, सुख-दुख और मान-अपमान में जिसके अंतःकरण की वृत्तियाँ भली-भाँति शांत हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मा वाले पुरुष में परमात्मा सम्यक् प्रकार से स्थित है।
भावार्थ
तीन द्वंद्व शरीर (सर्दी-गर्मी), भावना (सुख-दुख) और सामाजिक जीवन (मान-अपमान) को समेटते हैं। साधा हुआ मन इन सबमें शांत रहता है, और उसी शांति में परमात्मा अनुभव होता है।