शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३ ॥
śhaknotīhaiva yaḥ soḍhuṁ prāk śharīra-vimokṣhaṇāt kāma-krodhodbhavaṁ vegaṁ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ
हिंदी अर्थ
जो मनुष्य शरीर छूटने से पहले ही इस जीवन में काम और क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही योगी है और वही सुखी है।
भावार्थ
"वेगम्" — आवेग या बहाव। काम और क्रोध बाढ़ की तरह आते हैं। योगी वह नहीं जो उन्हें कभी अनुभव न करे, बल्कि वह है जो उस वेग को बहे बिना सह सके। श्रीकृष्ण कहते हैं, यही सामर्थ्य सुख है।