सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥ ९ ॥
sattvaṁ sukhe sañjayati rajaḥ karmaṇi bhārata jñānam āvṛitya tu tamaḥ pramāde sañjayaty uta
हिंदी अर्थ
हे भारत! सत्त्वगुण सुख में लगाता है, रजोगुण कर्म में, और तमोगुण ज्ञान को ढककर प्रमाद में लगाता है।
भावार्थ
यह श्लोक 6–8 का एक पंक्ति में सार है। हर गुण का अपना "गोंद" है: सुख, कर्म या प्रमाद। किसी क्षण में कौन-सा गोंद काम कर रहा है, यह जानना उसे ढीला करने का पहला कदम है।
