अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥
achchhedyo ’yam adāhyo ’yam akledyo ’śhoṣhya eva cha nityaḥ sarva-gataḥ sthāṇur achalo ’yaṁ sanātanaḥ
हिंदी अर्थ
यह आत्मा अच्छेद्य है, अदाह्य है, अक्लेद्य है और अशोष्य है। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।
भावार्थ
श्रीकृष्ण पिछले श्लोक को आत्मा के गुणों के रूप में दोहराते हैं, फिर पाँच सकारात्मक विशेषण जोड़ते हैं। "स्थाणु" (स्थिर) और "अचल" पर्वतों के लिए प्रयुक्त शब्द हैं — आत्मा मनुष्य में वह एकमात्र वस्तु है जो नहीं डगमगाती, चाहे चारों ओर जीवन कितना भी बदले।