आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥
ātma-sambhāvitāḥ stabdhā dhana-māna-madānvitāḥ yajante nāma-yajñais te dambhenāvidhi-pūrvakam
हिंदी अर्थ
अपने को ही श्रेष्ठ मानने वाले, अकड़े हुए, धन और मान के मद से युक्त वे लोग दंभपूर्वक, विधि-रहित, केवल नाम के यज्ञ करते हैं।
भावार्थ
"नामयज्ञ" (केवल नाम का यज्ञ) प्रदर्शन के लिए प्रयुक्त धर्म का वर्णन है: अपने नाम खुदवाकर बड़े दान, प्रतिष्ठा के लिए भव्य अनुष्ठान। समस्या अनुष्ठान नहीं, उसके पीछे का "दम्भ" (दिखावा) है।
