स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७ ॥
sparśhān kṛitvā bahir bāhyānśh chakṣhuśh chaivāntare bhruvoḥ prāṇāpānau samau kṛitvā nāsābhyantara-chāriṇau
हिंदी अर्थ
बाहर के विषय-भोगों को बाहर ही त्यागकर, और नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीच में स्थित करके, तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके,
भावार्थ
अंतिम तीन श्लोक ध्यान की एक झलक देते हैं, जिसे छठा अध्याय विस्तार से समझाएगा: बाहरी वस्तुओं से ध्यान हटाना, दृष्टि को भ्रूमध्य में स्थिर करना, और श्वास को सम करना।