आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि । मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥ २० ॥
āsurīṁ yonim āpannā mūḍhā janmani janmani mām aprāpyaiva kaunteya tato yānty adhamāṁ gatim
हिंदी अर्थ
हे कौन्तेय! वे मूढ़ जन्म-जन्मांतर आसुरी योनियों को प्राप्त होकर मुझे न पाकर, उससे भी अधम गति को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
"मामप्राप्यैव" (मुझे न पाकर) ही वास्तविक हानि है। आसुरी जीवन की त्रासदी केवल दुःख नहीं, बल्कि उस एक चीज़ को चूक जाना है जो उसे समाप्त कर सकती थी। अगला श्लोक तुरंत बाहर निकलने का मार्ग बताता है।
