ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४ ॥
brahmārpaṇaṁ brahma havir brahmāgnau brahmaṇā hutam brahmaiva tena gantavyaṁ brahma-karma-samādhinā
हिंदी अर्थ
अर्पण (स्रुवा आदि) भी ब्रह्म है, हवि भी ब्रह्म है, ब्रह्म रूपी अग्नि में ब्रह्म रूपी कर्ता द्वारा आहुति दी जाती है — ब्रह्म-कर्म में स्थित उस पुरुष को ब्रह्म ही प्राप्त होता है।
भावार्थ
"ब्रह्मार्पणम्" — यह श्लोक अनेक हिंदू घरों और आश्रमों में भोजन से पहले बोला जाता है। यह ऐसी दृष्टि का वर्णन करता है जिसमें अर्पण, अर्पण करने वाला, अग्नि और लक्ष्य — सब एक ही ब्रह्म हैं। इस प्रकार देखने पर खाना, काम करना, कुछ भी उपासना बन जाता है।