बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥
balaṁ balavatāṁ chāhaṁ kāma-rāga-vivarjitam dharmāviruddho bhūteṣhu kāmo ’smi bharatarṣhabha
हिंदी अर्थ
हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का कामना और आसक्ति से रहित बल हूँ, और सब प्राणियों में धर्म के अनुकूल काम हूँ।
भावार्थ
एक उल्लेखनीय श्लोक: काम भी दिव्य है जब वह धर्म के विरुद्ध न हो। गीता मानवीय इच्छा की निंदा नहीं करती — केवल उस इच्छा की जो नैतिक व्यवस्था को तोड़े। इसी प्रकार बल भी दिव्य है जब वह स्वार्थी आसक्ति से मुक्त हो।