आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३९ ॥
āvṛitaṁ jñānam etena jñānino nitya-vairiṇā kāma-rūpeṇa kaunteya duṣhpūreṇānalena cha
हिंदी अर्थ
हे कौन्तेय! इस अग्नि के समान कभी तृप्त न होने वाले कामरूप ज्ञानियों के नित्य शत्रु द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढका हुआ है।
भावार्थ
"दुष्पूरेण" — जिसे भरना कठिन है। ईंधन डाली गई अग्नि की तरह, कामना जितनी पूरी की जाए उतनी बढ़ती है। श्रीकृष्ण इसे ज्ञानियों का भी नित्य शत्रु कहते हैं; कोई भी स्वतः इससे सुरक्षित नहीं।