यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥
yaṁ hi na vyathayantyete puruṣhaṁ puruṣharṣhabha sama-duḥkha-sukhaṁ dhīraṁ so ’mṛitatvāya kalpate
हिंदी अर्थ
हे पुरुषश्रेष्ठ! जिस धीर पुरुष को ये (सुख-दुख) व्याकुल नहीं करते, जो सुख और दुख में समान रहता है, वही अमृतत्व (मोक्ष) के योग्य होता है।
भावार्थ
श्लोक 14 में संवेदनाओं को सहने की शिक्षा के बाद, श्रीकृष्ण अब उसका फल बताते हैं: समता से "अमृतत्व" — अमरता या मुक्ति — मिलती है। इसका अर्थ संवेदनहीन हो जाना नहीं। इसका अर्थ है हर सुखद या दुखद अनुभव से इधर-उधर न धकेले जाना — ऐसी स्थिरता जो मनुष्य को विवेक से कर्म करने देती है।