नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥
nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ ubhayorapi dṛiṣhṭo ’nta stvanayos tattva-darśhibhiḥ
हिंदी अर्थ
असत् (अनित्य) की सत्ता नहीं है और सत् (नित्य) का अभाव नहीं है। तत्त्वदर्शी पुरुषों ने इन दोनों का निष्कर्ष देख लिया है।
भावार्थ
गीता के सबसे दार्शनिक श्लोकों में से एक। "असत्" वह है जो बदलता और मिटता है — शरीर, संवेदनाएँ, परिस्थितियाँ; "सत्" वह है जो सदा है — आत्मा। वेदांत के विभिन्न संप्रदाय इस श्लोक का अलग-अलग अर्थ करते हैं, पर सभी इसके व्यावहारिक संदेश पर सहमत हैं: नश्वर को शाश्वत न समझें।