अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ १७ ॥
avināśhi tu tadviddhi yena sarvam idaṁ tatam vināśham avyayasyāsya na kaśhchit kartum arhati
हिंदी अर्थ
उसे अविनाशी जानो जिससे यह सब व्याप्त है। उस अव्यय (अविनाशी) का विनाश कोई नहीं कर सकता।
भावार्थ
श्रीकृष्ण पिछले श्लोक के "सत्" को वह बताते हैं जो पूरे शरीर में व्याप्त है — स्वयं चेतना। शरीर घायल हो सकता है, पर शरीर को जानने वाली चेतना काटी नहीं जा सकती। यही उनके इस निष्कर्ष का आधार बनेगा कि अर्जुन वास्तव में किसी को "मार" नहीं सकते।