Bhakti Arohan
ॐ

भगवद्गीता — अध्याय 15, श्लोक 13

पुरुषोत्तमयोग

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥

gām āviśhya cha bhūtāni dhārayāmy aham ojasā puṣhṇāmi chauṣhadhīḥ sarvāḥ somo bhūtvā rasātmakaḥ

हिंदी अर्थ

मैं पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब प्राणियों को धारण करता हूँ, और रसस्वरूप सोम (चंद्रमा) बनकर सब औषधियों (वनस्पतियों) का पोषण करता हूँ।

भावार्थ

इसके बाद जीवन। ईश्वर पृथ्वी को धारण करते हैं और वनस्पतियों का पोषण करते हैं। भारतीय परंपरा में चंद्रमा से जुड़ा "सोम" वह जीवनदायी रस है जिससे वनस्पतियाँ बढ़ती हैं, और लोक-मान्यता है कि जड़ी-बूटियाँ चाँदनी रातों में तोड़ने पर सबसे प्रभावी होती हैं। पूरी भोजन-श्रृंखला ईश्वर की ही शक्ति से शुरू होती है।

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