अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥
atha vā bahunaitena kiṁ jñātena tavārjuna viṣhṭabhyāham idaṁ kṛitsnam ekānśhena sthito jagat
हिंदी अर्थ
अथवा हे अर्जुन! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन है? मैं इस संपूर्ण जगत को अपनी योगशक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ।
भावार्थ
एक विस्मयकारी समापन: अपने सब आश्चर्यों सहित पूरा ब्रह्मांड ईश्वर के केवल एक अंश (एकांशेन) से धारण किया गया है। यह ग्यारहवें अध्याय की भूमिका बनाता है, जहाँ अर्जुन उस विराट रूप को अपनी आँखों से देखने की इच्छा करते हैं।