सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ २१ ॥
sukham ātyantikaṁ yat tad buddhi-grāhyam atīndriyam vetti yatra na chaivāyaṁ sthitaśh chalati tattvataḥ
हिंदी अर्थ
— इंद्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुई बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनंत आनंद है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है, और जिसमें स्थित वह योगी परमात्मा के स्वरूप से विचलित होता ही नहीं —
भावार्थ
"सुखम् आत्यन्तिकम्" — परम, असीम आनंद — इंद्रियाँ जो दे सकती हैं उससे परे। इसे शुद्ध बुद्धि जानती है, और एक बार प्राप्त हो जाने पर व्यक्ति उससे दूर नहीं भटकता।