यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ २७ ॥
yat karoṣhi yad aśhnāsi yaj juhoṣhi dadāsi yat yat tapasyasi kaunteya tat kuruṣhva mad-arpaṇam
हिंदी अर्थ
हे कौन्तेय! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर।
भावार्थ
शायद गीता की सबसे सरल आध्यात्मिक साधना: हर साधारण कर्म — काम, भोजन, दान — को अर्पण बना दो। बाहर कुछ बदलने की आवश्यकता नहीं; केवल उसके पीछे का भाव।