पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥
patraṁ puṣhpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayachchhati tadahaṁ bhaktyupahṛitam aśhnāmi prayatātmanaḥ
हिंदी अर्थ
जो कोई भक्तिपूर्वक मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, मैं उस शुद्ध हृदय वाले भक्त के प्रेमपूर्ण अर्पण को स्वीकार करता हूँ।
भावार्थ
यह श्लोक प्रायः यह समझाने हेतु उद्धृत किया जाता है कि हिंदू भक्ति अभ्यास में महंगे या भव्य अर्पण की आवश्यकता क्यों नहीं — सबसे साधारण वस्तुएँ भी, सच्चे भाव से अर्पित की जाएँ तो, स्पष्ट रूप से पर्याप्त बताई गई हैं। पूरा बल भक्ति और अर्पणकर्ता के भाव की शुद्धता पर है, न कि अर्पित वस्तु के भौतिक मूल्य पर।