Bhakti ArohanBhakti Arohan

भगवद्गीता — अध्याय 9, श्लोक 29

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ २९ ॥

samo ’haṁ sarva-bhūteṣhu na me dveṣhyo ’sti na priyaḥ ye bhajanti tu māṁ bhaktyā mayi te teṣhu chāpyaham

हिंदी अर्थ

मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ; न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय। परंतु जो भक्त मुझको प्रेम से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ।

भावार्थ

ईश्वर का कोई पक्षपात नहीं — उनका प्रेम सबके लिए समान है, सूर्य के प्रकाश की तरह। फिर भी जो भक्ति से उनके प्रति खुलते हैं, वे उस प्रेम को पूर्ण रूप से अनुभव करते हैं, जैसे खुली खिड़कियों वाला कमरा धूप पाता है।

भगवद्गीता अध्याय 9.29 | Bhakti Arohan