त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥ ४५ ॥
trai-guṇya-viṣhayā vedā nistrai-guṇyo bhavārjuna nirdvandvo nitya-sattva-stho niryoga-kṣhema ātmavān
हिंदी अर्थ
वेद तीनों गुणों के विषयों का वर्णन करते हैं; हे अर्जुन! तुम तीनों गुणों से ऊपर उठो। द्वंद्वों से मुक्त, सदा सत्त्व में स्थित, योग-क्षेम की चिंता से रहित और आत्मवान बनो।
भावार्थ
तीन गुण — सत्त्व, रजस् और तमस् — भौतिक जगत को बनाने वाले गुण हैं, और वेदों के कर्मकांडीय भाग इन्हीं के भीतर काम करते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन से इनके पार जाने को कहते हैं: "निर्द्वन्द्व" होना (सर्दी-गर्मी, प्रशंसा-निंदा जैसे द्वंद्वों से अछूता) और पाने व बचाए रखने की निरंतर चिंता (योग-क्षेम) से मुक्त होना।