यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥
yad akṣharaṁ veda-vido vadanti viśhanti yad yatayo vīta-rāgāḥ yad ichchhanto brahmacharyaṁ charanti tat te padaṁ saṅgraheṇa pravakṣhye
हिंदी अर्थ
वेद के जानने वाले जिसे अक्षर कहते हैं, आसक्ति-रहित यत्नशील संन्यासी जिसमें प्रवेश करते हैं, और जिसे चाहने वाले ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उस परम पद को मैं तुम्हारे लिए संक्षेप में कहूँगा।
भावार्थ
श्रीकृष्ण अब देह-त्याग की योग-पद्धति समझाते हैं। यह श्लोक कठोपनिषद् (1.2.15) से बहुत मिलता है, जो गीता की शिक्षा को वैदिक परंपरा से जोड़ता है।