प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥
prayāṇa-kāle manasāchalena bhaktyā yukto yoga-balena chaiva bhruvor madhye prāṇam āveśhya samyak sa taṁ paraṁ puruṣham upaiti divyam
हिंदी अर्थ
— वह भक्तियुक्त पुरुष अंतकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य परम पुरुष को ही प्राप्त होता है।
भावार्थ
योगी की मृत्यु को एक सचेत, भक्तिमय कर्म के रूप में वर्णित किया गया है: मन स्थिर, भक्ति से भरा, प्राण भ्रूमध्य में एकत्रित। यह उन्नत योग-साधना भी भक्ति से जुड़ी है।