यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ ६० ॥
yatato hyapi kaunteya puruṣhasya vipaśhchitaḥ indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṁ manaḥ
हिंदी अर्थ
हे कौन्तेय! प्रयत्न करते हुए विवेकी पुरुष के मन को भी ये प्रबल इंद्रियाँ बलपूर्वक हर लेती हैं।
भावार्थ
श्रीकृष्ण यह दिखावा नहीं करते कि मार्ग सरल है। पूरे प्रयास में लगा विवेकी व्यक्ति भी इंद्रियों से पराजित हो सकता है। "प्रमाथीनि" — मथ डालने वाली, उग्र — शब्द दिखाता है कि कोई लालसा कितनी अचानक हावी हो सकती है। अपनी दुर्बलताओं के प्रति विनम्रता ज्ञान का अंग है।