विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ ५९ ॥
viṣhayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ rasa-varjaṁ raso ’pyasya paraṁ dṛiṣhṭvā nivartate
हिंदी अर्थ
विषयों को ग्रहण न करने वाले देहधारी से विषय तो हट जाते हैं, पर उनका रस (लालसा) बना रहता है; परम तत्त्व का दर्शन होने पर वह रस भी मिट जाता है।
भावार्थ
एक ईमानदार और मनोवैज्ञानिक रूप से पैना श्लोक। उपवास या संयम वस्तु को हटा देता है, पर उसकी लालसा नहीं। केवल एक ऊँचा अनुभव — परम का दर्शन — भीतर की तृष्णा को मिटाता है। इसीलिए गीता केवल इच्छाशक्ति पर निर्भर न रहकर अनुशासन को भक्ति और ज्ञान के साथ जोड़ती है।