तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः । वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६१ ॥
tāni sarvāṇi sanyamya yukta āsīta mat-paraḥ vaśhe hi yasyendriyāṇi tasya prajñā pratiṣhṭhitā
हिंदी अर्थ
उन सब इंद्रियों को वश में करके, मुझमें परायण होकर योग में स्थित रहे। क्योंकि जिसकी इंद्रियाँ वश में हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।
भावार्थ
यहाँ गीता में पहली बार श्रीकृष्ण "मत्परः" — मुझमें परायण — कहते हैं। पिछले श्लोक में कठिनाई बताने के बाद वे समाधान देते हैं: केवल इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि मन को ईश्वर की ओर मोड़ना। यही भक्ति की उस शिक्षा का बीज है जो आगे के अध्यायों में खिलेगी।