क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥ ३ ॥
klaibyaṁ mā sma gamaḥ pārtha naitat tvayyupapadyate kṣhudraṁ hṛidaya-daurbalyaṁ tyaktvottiṣhṭha parantapa
हिंदी अर्थ
हे पार्थ! इस नपुंसकता (कायरता) को मत अपनाओ, यह तुम्हें शोभा नहीं देती। हे परंतप! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर उठ खड़े हो।
भावार्थ
"उत्तिष्ठ" — उठो — गीता के सबसे अधिक उद्धृत शब्दों में से है। श्रीकृष्ण अर्जुन के विषाद को करुणा नहीं, "हृदय-दौर्बल्य" कहते हैं, और उसे "क्षुद्र" इसलिए कहते हैं क्योंकि यह अर्जुन के वास्तविक स्वरूप के अनुरूप नहीं। वे उन्हें "परंतप" — शत्रुओं को तपाने वाला — कहकर उनके स्वभाव की याद दिलाते हैं। यह अभी प्रोत्साहन की भाषा है; दर्शन श्लोक 11 से आरंभ होता है।