किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः । तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥
kiṁ karma kim akarmeti kavayo ’pyatra mohitāḥ tat te karma pravakṣhyāmi yaj jñātvā mokṣhyase ’śhubhāt
हिंदी अर्थ
कर्म क्या है और अकर्म क्या है — इसके निर्णय में बुद्धिमान भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए मैं तुम्हें वह कर्म-तत्त्व बताऊँगा जिसे जानकर तुम अशुभ (संसार-बंधन) से मुक्त हो जाओगे।
भावार्थ
श्रीकृष्ण स्वीकार करते हैं कि यह सचमुच कठिन है — "कवयः", ज्ञानी और द्रष्टा भी भ्रमित हो जाते हैं। यह स्पष्ट नहीं कि कब कुछ करना बंधन है और कब न करना स्वयं एक कर्म है। वे इसे स्पष्ट करने लगते हैं।