यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् । क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥
yāvat sañjāyate kiñchit sattvaṁ sthāvara-jaṅgamam kṣhetra-kṣhetrajña-sanyogāt tad viddhi bharatarṣhabha
हिंदी अर्थ
हे भरतश्रेष्ठ! जो कुछ भी स्थावर-जंगम (अचर-चर) प्राणी उत्पन्न होता है, उसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न जानो।
भावार्थ
हर जीव, वृक्ष से लेकर मनुष्य तक, इन दोनों का मिलन है: जड़ और चेतन। अकेले कोई भी जीव नहीं बनाता। यह पूरे जीवन को देखने का एक दृष्टिकोण देता है: हर प्राणी में क्षेत्र को और उसे जानने वाले को खोजो।
