Bhakti ArohanBhakti Arohan

भगवद्गीता — अध्याय 9, श्लोक 15

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥

jñāna-yajñena chāpyanye yajanto mām upāsate ekatvena pṛithaktvena bahudhā viśhvato-mukham

हिंदी अर्थ

दूसरे ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण-निराकार ब्रह्म का ज्ञानयज्ञ द्वारा अभिन्न भाव से पूजन करते हुए भी मेरी उपासना करते हैं, और दूसरे मनुष्य बहुत प्रकार से स्थित मुझ विराट स्वरूप परमेश्वर की पृथक् भाव से उपासना करते हैं।

भावार्थ

श्रीकृष्ण विभिन्न दृष्टिकोणों का सम्मान करते हैं: कुछ उन्हें अपने से अभिन्न मानकर (अद्वैत), कुछ अपने से भिन्न मानकर (द्वैत), और कुछ उनके अनेक विराट रूपों में उपासना करते हैं। सभी एक ही ईश्वर तक पहुँचने के मान्य मार्ग हैं।

भगवद्गीता अध्याय 9.15 | Bhakti Arohan