सञ्जय उवाच । तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥
sañjaya uvācha taṁ tathā kṛipayāviṣhṭamaśhru pūrṇākulekṣhaṇam viṣhīdantamidaṁ vākyam uvācha madhusūdanaḥ
हिंदी अर्थ
संजय बोले: इस प्रकार करुणा से घिरे, आँसुओं से भरे व्याकुल नेत्रों वाले और विषाद करते हुए अर्जुन से मधुसूदन ने यह वचन कहा।
भावार्थ
दूसरा अध्याय ठीक वहीं से आरंभ होता है जहाँ पहला समाप्त हुआ था: रथ में आँसू बहाते बैठे अर्जुन। संजय फिर "कृपयाविष्टम्" — करुणा से घिरा हुआ — शब्द का प्रयोग करते हैं, यह स्पष्ट करते हुए कि यह भाव अर्जुन पर छा गया है, उन्होंने इसे सोच-समझकर नहीं चुना। मधु दैत्य का वध करने वाले मधुसूदन अब एक अलग शत्रु — मोह — का नाश करने वाले हैं।