सञ्जय उवाच । एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ ४७ ॥
sañjaya uvācha evam uktvārjunaḥ saṅkhye rathopastha upāviśhat visṛijya sa-śharaṁ chāpaṁ śhoka-saṁvigna-mānasaḥ
हिंदी अर्थ
संजय बोले: रणभूमि में ऐसा कहकर शोक से व्याकुल मन वाले अर्जुन बाण सहित धनुष त्यागकर रथ के आसन पर बैठ गए।
भावार्थ
अध्याय एक ठहराव पर समाप्त होता है। जिस महान धनुर्धर ने श्लोक 20 में धनुष उठाया था, वह अब उसे नीचे रखकर बैठ जाता है। इसीलिए इस अध्याय का नाम "अर्जुनविषादयोग" है — अर्जुन के विषाद का योग: गीता इस टूटन को भी मार्ग का अंग मानती है, क्योंकि जो व्यक्ति अपने सारे उत्तरों के अंत तक पहुँच जाता है, वही वास्तव में सुनने के लिए तैयार होता है। श्रीकृष्ण का उपदेश दूसरे अध्याय से आरंभ होता है।