यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥
yathā prakāśhayaty ekaḥ kṛitsnaṁ lokam imaṁ raviḥ kṣhetraṁ kṣhetrī tathā kṛitsnaṁ prakāśhayati bhārata
हिंदी अर्थ
हे भारत! जैसे एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करता है, वैसे ही क्षेत्री (क्षेत्रज्ञ) सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।
भावार्थ
दूसरी उपमा सूर्य की है। सूर्य सब कुछ प्रकाशित करता है, पर जिसे प्रकाशित करता है उससे स्वयं नहीं बदलता। इसी प्रकार चेतना पूरे शरीर को "प्रकाशित" करती है, हर अनुभूति और विचार को ज्ञात बनाती है, पर स्वयं वैसी ही रहती है।
