बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १५ ॥
bahir antaśh cha bhūtānām acharaṁ charam eva cha sūkṣhmatvāt tad avijñeyaṁ dūra-sthaṁ chāntike cha tat
हिंदी अर्थ
वह सब प्राणियों के बाहर और भीतर है, अचर भी है और चर भी। सूक्ष्म होने के कारण वह जानने में नहीं आता; वह दूर भी है और पास भी।
भावार्थ
"दूर और पास" ईशावास्य उपनिषद (श्लोक 5) की प्रतिध्वनि है: "तद्दूरे तद्वन्तिके"। जो ब्रह्म को अपने से बाहर खोजते हैं उनसे वह दूर है, और जो भीतर देखते हैं उनके लिए वह सबसे निकट। वह "अविज्ञेय" (जानने में न आने वाला) है, इसलिए नहीं कि वह छिपा है, बल्कि इसलिए कि वह इतना सूक्ष्म है कि किसी विषय की तरह पकड़ा नहीं जा सकता।
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