समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् । न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥
samaṁ paśhyan hi sarvatra samavasthitam īśhvaram na hinasty ātmanātmānaṁ tato yāti parāṁ gatim
हिंदी अर्थ
क्योंकि जो सबमें समान रूप से स्थित ईश्वर को देखता है, वह अपने द्वारा अपनी हानि नहीं करता, और इससे परम गति को प्राप्त होता है।
भावार्थ
"अपने द्वारा अपनी हानि" को दो तरह पढ़ा जा सकता है, और दोनों अर्थ अभिप्रेत हैं। जो दूसरों में ईश्वर को देखता है, वह उन्हें हानि नहीं पहुँचा सकता, क्योंकि उसमें स्वयं उसकी हानि है। और जो इस सत्य को भूल जाता है, वह अपनी आत्मा का पतन करता है। सर्वत्र ईश्वर को देखना यहाँ नैतिकता की जड़ के रूप में प्रस्तुत है।
