Bhakti Arohan
ॐ

भगवद्गीता — अध्याय 13, श्लोक 30

क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति । तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३० ॥

yadā bhūta-pṛithag-bhāvam eka-stham anupaśhyati tata eva cha vistāraṁ brahma sampadyate tadā

हिंदी अर्थ

जब कोई प्राणियों के अलग-अलग भावों को एक (परमात्मा) में स्थित देखता है, और उसी से सबका विस्तार देखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।

भावार्थ

यह गति दो तरफ़ा है: अनेक को एक में समाया देखना, और अनेक को उसी एक से फैलता देखना। जैसे हर लहर में समुद्र देखना और हर लहर को समुद्र से उठता देखना। ब्रह्म की अनुभूति को इसी दोहरी दृष्टि के रूप में बताया गया है, संसार के लुप्त हो जाने के रूप में नहीं।